ऋतुराज बसंत का आगमन! आह कैसा अनोखा जीवन सुख है । पतझड़ की नीरवता के बाद मीठे कंठ का सुरीला गायन । उदासी के सारे सूखे पत्ते नई कोंपलों के आगमन से दूर छिटक गए हैं । ऋतुराज की तरह, धरती की तरह, जंगल की तरह, फूल की तरह जीवन मुस्कुराने लगा है। सच अद्भुत है ये जीवन का ऋतु चक्र और अद्भुत है ऋतु चक्र का यह बासंती उपहार !
पेड़ की शाखों से नई कोंपलें फूट पड़ीं हैं। टहनियों पर कलियाँ चटकने लगीं हैं। बागों में फूल महकने लगे हैं। खेतों में हरियाली लहराने लगी है । सरसों की पीली चुनरिया मुस्कराने लगी हैं। टेसू पलाश दूर से चमकने लगे हैं । गौर से सुनो प्रियंवदा कोकिल कूकने लगी है। प्रकृति के आँगन में बासंती बयार बहने लगी है। लोगों की मुस्कान से फूटता उत्साह गीत कह रहा है, सचमुच ऋतुराज बसंत आ गया।
ऋतओं के देश भारत में ऋतुराज बसंत का आगमन ! वह देश जहाँ ऋतुओं के बदलने से जीवन के मायने बदल जाते हैं, जिस देश में धर्म, सभ्यता, लोक संस्कार और आध्यात्म भी ऋतुओं से जुड़ कर ही आकार लेते हैं। वहाँ रंगीले, मनभावन, मदन मित्र का आगमन निःसंदेह निराला पर्व होता है। इस उल्लासदायिनी ऋतु के आगमन से गमन तक का हर क्षण धरा के कण-कण को खुशियों से सराबोर कर देता है।
संसार भर में बसंत का मौसम उल्लास का काल माना जाता है भारत के लिए तो यह उत्सवों के उत्सव का चरम आनंद है। ऋतुचक्र परिवर्तित होना, जड़ चेतन सबके अंतरतर में आनंद का शतदल प्रस्फुटित होना और उस पर मनुष्य के मदिर चित्त से निकली हुई कल्पनाओं का साकार होना एक आलौकिक सुख प्रदान करता है। अति प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ बसंतोत्सव मनाने की परम्परा रही है कभी अशोक दोहद के रूप में, कभी मदन देवता की पूजा के रूप में, कभी कामदेवायन – यात्रा के रूप में, कभी आम्र तरू और माधवी लता के विवाह के रूप में, कभी होली के हुड़दंग में, कभी सरस्वती पूजा के रूप में, कभी श्रीपंचमी के रूप में.. समूचा बसंत काल उत्सव का ही पर्याय बना रहा है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी इस ऋतु का सर्वत्र उल्लेख है। हरित संहिता के अनुसार बसंत ऋतु में पशु पक्षी तथा मनुष्य सभी प्राणी मदन बाण से भेदे जाते हैं । सम्राट हर्ष ने अपनी रत्नावली नाटिका में अशोक वृक्ष के नीचे स्त्रियों द्वारा मदन पूजा का वर्णन किया है। महाकवि कालीदास ने अभिज्ञान शकुंतलम, रघुवंश और मालविकाग्निमित्रम में इसे ऋतुत्सव का नाम दिया है । वात्सयायन ने बसंत को सुबसतक कहा है। बसंत की प्रथम पूर्णिमा के तेरहवें दिन मनाये जाने के कारण प्राचीन काल में यह बसंत त्रयोदशी के नाम से मनाया जाता रहा था।
सामंत वर्ग और राजपरिवारों में मदन महोत्सव मनाने का प्रचलन था।
किसानों के लिए नवान्न उत्सव, तो विद्यार्थियों के लिए विद्या पर्व अर्थात सरस्वती पूजा का पर्व है । श्री पंचमी ,बसंत पंचमी अर्थात संस्कृतिवर्ष, भारतीय संस्कृति के लिए बसंतोत्सव सचमुच प्राचीन स्मृतियों का एक सुखद स्मरण है जो वर्तमान से जुडकर और भी प्रिय हो जाता है ।
वस्तुत: बसंत है क्या ? ज्योतिष के अनुसार यह धरती की मध्य रेखा का सूर्य के ठीक सामने पहुँच जाने के आस पास का समय है पर क्या मात्र धरती के सूर्य से साक्षात्कार होने पर ही सारी प्रकृति का अंग अंग थिरकने लगता है ।
इतना छोटा कारण और इतना बडा उत्सव ! मान्यता तो यह है कि महासूर्य कभी विभक्त होकर दो हो गया था । एक तो सूर्य बिंब के रूप में प्रतिष्ठित सूर्य नक्षत्र और दूसरा खंड यह धरती, लाखों वर्षों पूर्व हुए महासूर्य के इस विभाजन को शायद धरती कभी नही भूली | कहा जाता है कि धरती सूर्य से विलग होने पर भी उसमें मिल जाने को सदैव आतुर रही है| सदियों की यह विरहना जब सूर्य के सामने आती है तो उसका रोम रोम पुलकित हो उठता है और वह सूर्य से मिलकर एकाकार हो जाने को उत्सुक हो उठती है। शायद मिलन की इसी आस में धरती चक्कर पर चक्कर लगा रही है और सदियाँ इतिहास बनकर बदलती जा रही है ।ज्योतिष, धर्म, विज्ञान और संस्कृति के तर्कों से बसंतोत्सव का ऐसा वर्णन भारत को छोड़ कर और कहाँ मिलेगा ?
उमंग, उल्लास का यह सर्वथा अनूठा पर्व कवियों की कल्पना से और भी अनुपम हो गया है । बसंत ऋतु का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि पशु – पक्षी मनुष्य के साथ प्रकृति का कण – कण नाचने और गाने लगता है तो कवि की कलम स्वत: ही मुखर हो उठती है ।
कवि ‘चंद्रप्रकाश चंद्र’ जी की कुछ पंक्तियाँ,
सजि आयो रे, ऋतु बसंत सजि आयो ।
अजी गाओ रे, ऋतु बसंत सजि आयो ।
कली – कली करते कलोल कुसुम मन, मंद- मंद मुस्कायो ।
गुन-गुन-गुन-गुन गूँजे मधुप गन, मधु मकरंद चुरायो ।।
सजि आयो रे, ऋतु बसंत सजि आओ ।
अजी गायो रे, ऋतु बसंत सजि आयो।
जिस ऋतु का प्रवाह इतना निर्मल हो कि सृष्टि की सारी कालिमा धुल जाती हो
भारतीय कवियों के बसंत प्रेम की कविताओं का उल्लेख करें तो शायद एक ग्रंथ बन जाए ।महाकवि कालीदास, भारतेन्दु, सेनापति, भूषण, मतिराम, बिहारी, निराला से लेकर आधुनिक कवि तक बसंत काव्य की बहार है ।
समय के साथ कविता बदल गई पर बसंत फिर भी पूरे सौंदर्य के साथ कविताओं से छलकता रहा । आज भी बसंत पूरे श्रृंगार के साथ प्रकृति को दुल्हन बना देता है ।आज भी ऋतुराज दूल्हा बनकर बारात लेकर ब्याह रचाने आता है ।आज भी टेसू महकते हैं, पलाश सुर्ख हो उठते हैं, कलियाँ चटक उठती हैं और कोयल गा उठती है । पर क्या आज भी हमारा मन – मयूर बसंत के साथ उतनी ही उन्मुक्तता के साथ नृत्य कर पाता है?
समय के चक्र ने जीवन के मायने बदल दिए हैं । भारतीय संस्कृति शायद अपनी विरासत को ज्यादा दिन तक सहेजकर चलना अब पसंद नहीं करती । अब यहाँ के उत्सव और त्यौहार पूर्व की तरह नहीं मनाएँ जाते पर हृदय पर हाथ रख यदि हम सब अपने अंतरमन को टटोलें तो क्या सचमुच हमारे भीतर का अनुराग बसंत को नकार पाएगा ? संवेदनाओं के धरातल पर अभी स्पंदन शेष है ।
देखिए, जरा गौर से देखिए आज का हमारा बसंत फिर हमारी देहरी तक आ पहुँचा है । कानों से सुनिए कोकिला अब भी कूक रही है । वह देखिए धरती और सूर्य के प्रेम का उत्सव अब भी चल रहा है । प्रेम ही जीवन का मूल स्वर है | आत्मोत्सर्ग ही सुख का जन्मदाता है ।जीवन के इस महायज्ञ की महत्ता तभी है जब श्रम साधना से सत्य निचोड़ लिया जाए और खुद को धरती की तरह उदार बना लिया जाए ।
सृष्टि का यह इतना व्यापक आयोजन व्यर्थ नहीं है । बसंत का आगमन मात्र ऋतु का परिवर्तन नहीं है ।
यह है उत्सव का उत्सव, चरम आनंद का क्षण, स्नेह का पर्व, मिलजुलकर रहने की संस्कृति, उत्साह का प्रतीक, जीवन का ऋतु चक्र और ऋतु चक्र का यह बासंती उपहार ….
इसी बसंती ऋतु के बहार के साथ हम भी अपने जीवन में हमेशा बहरते रहे ।
– सौ. माधुरी यादव
(हिंदी विभाग प्रमुख)