कल- कल निनाद करती अपनी मौज में समृद्ध हो,
कहना ही पड़ेगा आख़िर “ओ, नदी तुम अद्भुत हो”।
सूर्योदय के साथ चला आता जनसमूह का रेला,
हर गंगे की ध्वनि से भर उठती व प्रभात की प्यारी बेला ।
देश नदियों का कहलाता है मेरा भारत,
मोक्ष दिलाने में भी हासिल है तुमको महारथ ।
व्रत, तप, यज्ञ अधूरे है जैसे दान के बिना,
कई त्यौहार अधूरे है नदियों में स्नान के बिना।
कृष्ण लीलाएँ हुई जहाँ वो यमुना का तीर हो,
चाहे पापनाशिनी, मुक्तिदायनी पावन गंगा का नीर हो
विश्व में जलस्रोत के भंडार भरे तुमसे है,
प्रकृति के सारे नजारें हरे-भरे तुमसे है।
जलचर प्राणियों का तो आधार तुमसे है,
अतिशयोक्ति नहीं कहने में धरा का श्रृंगार तुमसे है।
छुपाए रखती हो खुद में कितने शंख, सीप और मोती,
घाटों के, संगमों के मायने ना होते गर नदियाँ ना होती।
शिप्रा, अलखनंदा, कावेरी, गंगा और यमुना,
नाम कोई भी हो तुम्हारे कीर्ति किसी की कम ना ।
गूँजती है तुम्हारे किनारों पर पक्षियों की चहचहाट,
वेद, पुराणों का पठन कहीं मंत्रों की आहट।
मानसिक अशांति हो जब या मनस्थिति हो व्याकुल,
अपार शांति मिलती तुम्हारे किनारे से बीते जब कुछ पल ।
सौम्यता, निर्मलता, शीतलता तुम में समाई,
कोई भी रुकावट गति तुम्हारी कभी ना रोक पाई।
रौद्र रूप धारण करती जब प्रलय भी ले आती हो,
सहनशीलता की हद होनी चाहिए मानों ये बतलाती हो ।
पूर्ण चाँद की छाया हो या डूबते सूरज की शाम,
चमके दोनों ही जब तुम्हारे जल में नजारा होता नयनाभिराम ।
तुमसे ही कायम है प्रकृति का अस्तित्व,
नदियों ने ही समेट रखा है दीपदान का महत्त्व ।
यूँही अपनी रवानी में अनंतकाल तक बहती रहना,
चलते रहना ही जीवन है सबसे ये कहती रहना।
मानवता का पाठ पढ़ाती, ऊँच- नीच का भाव मिटाती,
हर प्राणी की तृष्णा मिटाती, “ओ, नदी तुम सचमुच अद्भुत हो ।”
– सौ. माधुरी यादव
(हिंदी विभाग प्रमुख)